शनिवार 23 मई 2026 - 14:29
हज़रत इमाम बाकिर अलैहिस्सलाम के नज़रिए से मुंतज़िरीन ए इमाम ज़माना अलैहिस्सलाम की तीन ज़िम्मेदारियाँ

हौज़ा / हज़रत मासूमा (स.ल.) के रौज़े में मग़रिब और इशा की नमाज़ से पहले हुज्जतुल इस्लाम मोहम्मद रज़ा नसूरी ने इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) की शहादत की मुनासिबत से सूरह आले इमरान की आयत 200 की तफ़सीर बयान करते हुए इमाम ज़माना (अ.स.) के इंतज़ार करने वालों की तीन अहम ज़िम्मेदारियों पर रौशनी डाली।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , हज़रत मासूमा (स.ल.) के रौज़े में मग़रिब और इशा की नमाज़ से पहले हुज्जतुल-इस्लाम मोहम्मद रज़ा नसूरी ने इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) की शहादत की मुनासिबत से सूरह आले-इमरान की आयत 200 की तफ़सीर बयान करते हुए इमाम ज़माना (अ.स.) के इंतज़ार करने वालों की तीन अहम ज़िम्मेदारियों पर रौशनी डाली।

उन्होंने कहा कि इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) ने आयत «يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اصْبِرُوا وَصَابِرُوا وَرَابِطُوا» (ऐ ईमान वालो! सब्र करो, मुक़ाबला करने में सब्र करो और मुजाहिदा में जुड़े रहो की तफ़सीर में फ़रमाया:

1.इस्बिरू" (सब्र करो) से मुराद फ़राइज़ को अदा करने में सब्र व इस्तिक़ामत है। इंसान को नमाज़, रोज़ा और दूसरे फ़राइज़ को बेहतरीन अंदाज़ में अंजाम देना चाहिए।

2. व साबिरू" (मुक़ाबले में सब्र करो) का मतलब दुश्मनों के मुक़ाबले में साबित-क़दम रहना है। मोमिन को चाहिए कि वह दुश्मन को पहचाने ताकि उसके अक़ीदे दुश्मन की साज़िशों और फरेब का शिकार न हों।
3.व राबितू से मुराद अपने इमाम ज़माना (अ.स.) की हिफ़ाज़त और उनसे मज़बूत ताल्लुक़ (संबंध) क़ाएम रखना है। इंसान को हमेशा इस बात का ख़याल रखना चाहिए कि उसके आमाल उसे अपने इमाम (अ.स.) से दूर न कर दें।

हुज्जतुल इस्लाम नसूरी ने पैग़म्बर-ए-अकरम हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा स.ल. की हदीस नक़ल करते हुए कहा,जो शख़्स अपने ज़माने के इमाम को पहचाने बग़ैर मर जाए, वह जाहिलियत की मौत मरता है।इसलिए हर दौर में इमाम की मारिफ़त हासिल करना हर मुसलमान की ज़िम्मेदारी है।

हरम के ख़तीब ने इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) से मरवी रिवायत का हवाला देते हुए कहा कि जो शख़्स चालीस दिन तक दुआ-ए-अहद पढ़े और ज़ुहूर-ए-इमाम ज़माना (अ.ल.) से पहले दुनिया से चला जाए, वह रजअत करने वालों में शुमार होगा।

आख़िर में उन्होंने इमाम ज़ैनुल आबिदीन (अ.स.) का यह फ़रमान भी नक़ल किया कि ज़माना-ए-ग़ैबत में इमाम-ए-ज़माना (अ) की इमामत पर यक़ीन रखने वाले और उनके ज़ुहूर के इंतज़ार करने वाले लोग अपने ज़माने के बेहतरीन इंसान हैं।

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